Thursday, October 27, 2022

बीकानेर : स्थापना से आजादी तक-25

इसके बाद इस फटे में पैबन्द लगाने की सादुलसिंह ने कोशिशें बहुत की। लम्बे समय से लम्बित उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिए नया संविधान लागू किया। लेकिन विधानसभा का गठन ऐसी चतुराई से किया कि जैसा वे चाहें वैसा ही हो। मताधिकार को सीमित करने के बावजूद विधानसभा में मनोनीत लोगों का बहुमत रखा। कथित प्रजा परिषद् के चौ. हरदत्तसिंह को प्रधानमंत्री के साथ गृहमंत्री, चौ. कुम्भाराम को राजस्व मंत्री, गौरीशंकर आचार्य को शिक्षामंत्री और सरदार मस्तानसिंह को स्वायत्त शासन मंत्री बनाया। नये बने मंत्रियों ने रीजनल कौसिल के प्रस्ताव के विरुद्ध और देशहित के खिलाफ बीकानेर राज्य को अलग इकाई की शर्त मान कर मंत्री पद, कार, बंगले हासिल कर लिये। इस सब के बावजूद विधानसभा और सरकार का गठन जिस तरह किया गया, उसकी साख टके भी नहीं बन पायी।

इस कथित प्रजा परिषद् ने जो बीकानेर राज्य से समझौता किया उसे प्रांतीय और केन्द्रीय नेताओं ने स्वीकार नहीं किया। इस समझौते के विरोध में बीकानेर में सभाएं-आन्दोलन हुए, जिनमें सर्वाधिक सक्रिय लोगों में रघुवरदयाल गोईल, गंगादास कौशिक, दाऊदयाल आचार्य, एडवोकेट चेतनदास मूंधड़ा, एडवोकेट केवलचन्द बेहड़, एडवोकेट लखपतराय गांधी, डॉ. छगन मोहता, एडवोकेट हरिशंकर बगरहट्टा, पत्रकार जानकी प्रसाद बगरहट्टा मुख्य थे।

इस बीच राजा ने भी अपने समर्थकों को सक्रिय किया। तब पोस्टकार्ड दो पैसे का था। सरदार पटेल का पता लिखे पोस्टकार्ड में यह संदेश लिखकर शहर में बांटे गये कि हम अपनी रियासत का अलग अस्तित्व चाहते हैं। लेकिन अधिकतर जनता ने इसकी भाषा में यह कारीगरी करके पोस्ट किया कि वह बीकानेर रियासत का भारत संघ में पूर्ण विलीनीकरण चाहते हैं।

इन्हीं सब घटनाओं के बीच छह माह में ही स्थानीय सरकार को इस्तीफा देना पड़ा। इसके बाद कथित प्रजा परिषद् के नेताओं में भ्रष्टाचार को लेकर फूट पड़ गयी। आपसी आरोप-प्रत्यारोपों के बीच नौबत यहां तक पहुंची कि चौधरी दीपचन्द ने एक रात स्वामी आश्रम जाकर कर्मानन्द पर तीन फायर कर दिये। एक गोली कर्मानन्द के पांव में लगी, कर्मानन्द बच गये लेकिन उन्होंने पेम्फलेट निकाल कर नाम के साथ चौधरी कुंभाराम और दीपचन्द पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाये।

यहां यह सब कुछ चलता रहा वहीं सरदार पटेल ने राजस्थान की रियासतों के भारत संघ में पूर्ण विलीनीकरण की प्रक्रिया शुरू कर दी। पहले-पहल अलवर, भरतपुर, करौली और धौलपुर रियासतों को मिलाकर 'मत्स्य संघ' बनाया। फिर कोटा, बांसवाड़ा आदि नौ रियासतों का एकीकरण कर राजस्थान यूनियन का विधिवत निर्माण किया गया। बीकानेर के सादुलसिंह इसके खिलाफ रहे और उदयपुर महाराणा को अपने साथ कर लिया। लेकिन उदयपुर महाराणा जल्द ही सादुलसिंह का साथ छोड़ एकीकरण में शामिल हो गये। इससे सादुलसिंह का हौसला तो पस्त हो गया लेकिन आखिरी कौशिश में उन्होंने देशभक्तों के मुकाबले डाक्टरों, प्रोफेसरों, वकीलों, पूर्व न्यायाधीशों और सेवानिवृत्त उच्च अधिकारियों जैसे रियासती भक्तों का 'विलीनीकरण विरोधी मोर्चा' खड़ा किया। राजपूत सभा नाम से जागीरदारों का मोर्चा बनवाया। अब तक मुस्लिम समुदाय आजादी के आन्दोलन में शामिल नहीं था उन्हें भी उकसाया कि राजा के प्रति अपनी वफादारी का प्रदर्शन करें। इसके लिए सादुलसिंह ने हिन्दू महासभा, आरएसएस की ही तरह देश के बंटवारे के लिए जिम्मेदार मुस्लिम लीग की सेवाएं लेने से भी संकोच नहीं किया। संस्कृत विद्वान् विद्याधर शास्त्री के नेतृत्व में राजा समर्थक 'प्रजा सेवक संघ' खड़ा किया तो पूर्व न्यायाधीश बद्रीप्रसाद व्यास के नेतृत्व में बीकानेर 'लोक सेवक संघ' का गठन किया। हुआ यह कि देश भर में जो जागरूकता फैली, उसमें सादुलसिंह की उक्त सभी कारस्तानियां बेअसर साबित हुईं। 

दूसरी ओर बीकानेर की असल प्रजा परिषद् वाले महात्मा गांधी की प्रेरणा से सामाजिक कार्यों में जुट गये। 26 सितंबर, 1948 से हजार से ज्यादा लोगों ने हरिजन बस्ती में केवल स्वच्छता अभियान चलाया बल्कि हरिजनों के साथ खानपान भी किया। इस अभियन के मुख्य कार्यकर्ताओं में 18 ब्राह्मण थे जिनमें दाऊदयाल आचार्य के अलावा दुर्गादत्त किराड़ू, गंगादत्त रंगा, लक्ष्मीनारायण हर्ष और डॉ. छगन मोहता। इन सभी को बद्रीप्रसाद व्यास ने जाति से बाहर करवा दिया। इनमें एक युवा छोटूलाल व्यास भी थे जो नियमित दर्शन के लिए लक्ष्मीनाथ मन्दिर जाते थे। उक्त स्वच्छता अभियान के बाद बीकानेर लोक सेवक संघ के बद्रीप्रसाद व्यास ने सादुलसिंह की शह पर छोटूलाल व्यास को लक्ष्मीनाथ मन्दिर में प्रवेश यह कहकर नहीं करने दिया कि तुम अब से हरिजन हो, न्यात से बाहर हो। इस पर 27 सितंबर को छोटूलाल व्यास मन्दिर के गेट पर अपने तीन साथियोंचिरंजीलाल स्वर्णकार, सोहनलाल मोदी और किशनगोपाल गुट्टड़ के साथ अनशन पर बैठ गये। इस अनशन की चर्चा और चिंता पूरे देश में प्रकट की गयी। इन 4 अनशनकारियों के काउण्टर में रियासत ने 14 लोगों को अनशन पर बिठवाया, लेकिन वे दो दिन में फिस गये। गुंडों को भी भेजा गया, पर पार नहीं पड़ी। इन बदमजगियों को करवाने के इनाम के तौर पर सेवानिवृत्त बद्रीप्रसाद व्यास को सादुलसिंह ने बीकानेर हाइकोर्ट का जज नियुक्त कर दिया।

17 अक्टूबर, 1947 को इनका अनशन तुड़वाने खुद विनोबा भावे आये। उन्होंने इन चारों को इस बात पर मनाया कि जिस मन्दिर में हरिजनों का प्रवेश वर्जित है, उस मन्दिर में हमें नहीं जाना चाहिए। इस प्रकार छोटूलाल व्यास के नेतृत्व में 23 दिन चला अनशन समाप्त हुआ। 

लेकिन हर रात्रि के बाद पौ फटती है। बीकानेर रियासत के असल सेनानियों का संकल्प पूरा हुआ। देश चाहे 15 अगस्त, 1947 को आजाद हो गया लेकिन बीकानेर रियासत के बाशिन्दों को आजादी 7 अप्रेल, 1949 को तब मिली जब अपनी सभी करतूतों के बावजूद महाराजा सादुलसिंह को विलीनीकरण प्रपत्र पर हस्ताक्षर करने पड़ गये।      

   —दीपचंद सांखला

27 अक्टूबर, 2022

Wednesday, October 19, 2022

बीकानेर : स्थापना से आजादी तक-24

1946 आते-आते अंग्रेजों ने सत्ता भारतीयों को सौंपने का मन बना लिया। इस सत्ता हस्तांतरण का एजेन्डा क्या होगा, इस पर काम होने लगा। जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग जहां मुसलमानों के लिए अलग देश का राग अलाप रही थी, वहीं तब तक आजादी में रुचि नहीं लेने वाली हिन्दू महासभा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ बंटवारे की चिंगारी को हवा हिन्दू राष्ट्र की उम्मीद में दे रहे थे। देशी रियासतों की सम्प्रभुता ब्रिटिश क्राउन में निहित थी, जिनके बारे में अंग्रेज स्पष्ट कर चुके थे कि सत्ता का जैसे ही हस्तांतरण होगा, प्रभुसत्ता स्वत: ही समाप्त हो जायेगी। अंग्रेजी चाल खेल कर यह छूट दी कि मुस्लिम लीग और देशी रियासतों के शासकों के संगठन नरेन्द्र मण्डल चाहे तो संविधान निर्मात्री समिति में शामिल हो, चाहे तो हो।

कुछ रियासतें स्वतंत्र भारत संघ में विलय से सहमत थीं, तो कुछ नहीं। इस पर नेहरू को चेतावनी देनी पड़ी कि 'जो राजा-लोग विधान निर्मात्री समिति में शामिल होकर देश को विघटन की ओर धकेलने की नीयत रखते है, उसे देशद्रोहीता पूर्ण कार्य माना जायेगा।'

इसके बाद बने माहौल में जो राजा संविधान निर्मात्री परिषद् में शामिल नहीं होने की नरेन्द्र मण्डल की घोषणा से असहमति प्रकट कर चुके, उन शुरुआती राजाओं में बड़ौदा-कोचीन के राजाओं के साथ बीकानेर के सादुलसिंह भी थे। इस घोषणा से देश भर में सादुलसिंह की वाहवाही हुई। रियासतों के विलीनीकरण को लेकर यह धारणा बनी कि मुगलों और अंग्रेजों के समय की तरह विदेश, रक्षा और संचार को छोड़कर शेष सभी मामलों में रियासतें स्वतंत्र होंगी। इसी वहम में सादुलसिंह ने अपनी रियासत के उन लोगों को सबक सिखाने की ठान ली जो पूर्ण स्वतंत्रता के साथ भारतीय संघ में शामिल होने की बात करते थे। इस वहम में महाराजा के व्यवहार का दोगलापन सामने आने लगा। अपनी पैठ बनाये रखने के लिए साम्प्रदायिक दंगा करवाने में भी संकोच करने वाला शासन जातीय वैमनस्य पैदा करने से कब चूकने वाला था। जाति आधार पर प्रजा परिषद् में गुट बनवा दिये। सादुलसिंह की शह में जाटों के एक समूह ने अपना अलग गुट बना कर स्वामी कर्मानन्द को अध्यक्ष बना रघुवरदयाल गोईल को अलग-थलग कर दिया। इतना ही नहीं, कार्यालय मंत्री सत्यप्रकाश गुप्ता को पद से इसलिए हटा दिया ताकि उनकी कारस्तानियों की जानकारी लीक हो। 

नयी बनी कार्यकारिणी में रामचन्द्र जैन उपाध्यक्ष, प्रो. केदार महामंत्री बनाये गये और गौरीशंकर आचार्य कोषाध्यक्ष। इन सब का स्वामी कर्मानन्द और कुम्भाराम के गुट में शामिल होना आश्चर्यजनक था। 

गोईल को कार्यकारिणी में नहीं रखा। ऐसी सूचनाओं से प्रान्तीय नेताओं में खलबली मचना लाजमी था। प्रान्तीय नेता बीकानेर आये और नयी बनी कार्यकारिणी में गोईल को लेने के लिए तैयार करना चाहा। लेकिन गोईल ने यह कह कर कार्यकारिणी में आने से इनकार कर दिया कि सत्ता के इन भूखे-भेड़ियों के साथ मुझे  काम नहीं करना।

इसी बीच वह दिन—15 अगस्त, 1947 गया जिसका इन्तजार सभी को था। गोईल के साथियों ने ईदगाह बारी के बाहर स्थित खुले मैदान में झंडा फहराना तय किया। इसकी सूचना सादुलसिंह तक पहुंची जिसे वे पचा नहीं पाये। 14 की रात 11 बजे नाजिम ने नोटिस तामील करवा कर गोईल को पाबन्द किया कि तिरंगे के साथ रियासत का झंडा भी फहराना होगा। गोईल के घर नाजिम आए तब दाऊदयाल आचार्य वहीं थे। नाजिम के लिखित आदेश को नजरअंदाज कर सुबह बीकानेर के सैकड़ों बाशिंदों के बीच केवल तिरंगा फहराया गया। यहां यह स्मरण करवाना उचित है कि नाजिम के उक्त आदेश पर डॉ. छगन मोहता ने तभी एक व्यंग्य लिखा जो जे. बगरहट्टा के सम्पादन में प्रकाशित होने वाले 'गणराज्य' में छपा। तेलीवाड़ा चौक में रहने वाले डॉ. छगन मोहता ने चुटकी लेते हुए लिखा कि तिरंगे के साथ हमें तेलीवाड़े का झंडा फहराने का हक क्यों नहीं है।

तिरंगे के साथ रियासत का झंडा फहराने से चिढ़ कर रियासती शासन ने क्रूरता का नया दौर शुरू कर दिया। प्रजा परिषद् के दूसरे गुट के कार्यकर्ताओं को धमकाया और गिरफ्तार किया जाने लगा। वहीं प्रजा परिषद् के मुखिया बने स्वामी कर्मानन्द साम्प्रदायिकता को हवा देने लगे।

यहां यह उल्लेख करना जरूरी है कि जेल में बंद प्रजा परिषद् के सभी नेताओं को 15 अगस्त 1947 से पूर्व छोड़ दिया गया, लेकिन हीरालाल शर्मा को नहीं छोड़ा गया, उन्हें यातनाएं देना जारी रखा।  इतना ही नहीं गंगादास उर्फ दासी महाराज और कथित पत्रकार तारानाथ रावल जैसों को झूठा गवाह बना कर हीरालाल शर्मा पर मुकदमा चलाया गया और तीन वर्ष की सख्त कैद की सजा भी सुना दी गयी। लेकिन बदली परिस्थितियों में अंतपंत जनवरी 1948 को हीरालाल शर्मा को भी रिहा ना कर पड़ा।

महाराजा सादुलसिंह ने 7 अगस्त 1947 को इन्स्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन यानी विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये, लेकिन खुदमुख्तारी के लालच से मुक्त नहीं हुए। विलय पत्र के अनुसार विदेश, रक्षा और संचार के मामले उनके अधीन नहीं थे, फिर भी पाकिस्तान की बहावलपुर रियासत के प्रधानमंत्री के साथ गुप्त तौर पर व्यापारिक समझौते कर लिये। इसकी जानकारी पत्रकारिता करने वाले सेनानी दाऊदयाल आचार्य को मिल गयी। कालापानी भोग चुके आचार्य ने कैसे भी अंजाम की परवाह करते हुए इसकी खबर बना कर आधी रात को तारघर पहुंचे और हिन्दुस्तान टाइम्स को तार द्वारा भेज दी, जिसे हिन्दुस्तान टाइम्स ने रिवर्स ब्लैक बॉक्स में हाथोंहाथ प्रकाशित कर दिया। विलय-पत्र हस्ताक्षर करने के बावजूद सादुलसिंह की ऐसी कारस्तानियों ने केन्द्रीय नेताओं को चौकन्ना कर दिया। विलय-पत्र पर हस्ताक्षर करने वाले शुरुआती राजाओं में दर्ज होने से जो कीर्ति सादुलसिंह की फैली थी, वह इस प्रकरण से घुल  गयी। ऐसी घटनाओं के मद्देनजर सरदार पटेल को मजबूर होना पड़ा कि पूर्व विलय-पत्र को खारिज कर, रियासतों के पूर्ण विलय के पत्र पर हस्ताक्षर करवाया जाएं। क्रमशः

दीपचंद सांखला

20 अक्टूबर, 2022

Thursday, October 13, 2022

बीकानेर : स्थापना से आजादी तक-23

31 अगस्त को शासन ने संवैधानिक सुधारों की घोषणा की, लेकिन साथ ही दमन भी चालू रखा। अक्टूबर-नवम्बर आते-आते दमन का पुरजोर दौर फिर शुरू हो गया। नोहर में मालचन्द हिसारिया, भादरा में चौ. रामलाल, गंगानगर में रामचन्द्र वकील को गिरफ्तार कर जेल में ठूंस दिया। 2 अक्टूबर 1946 . को गांधी जयंती पर संगरिया में आयोज्य जुलूस पर रोक लगा दी। चौ. कुंभाराम, वकील रामचन्द जैन, चौ. हरदत्त सिंह, हंसराज आर्य, सरदार गुरुदयालसिंह समेत अनेक-नेताओं-कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां की गयीं।

मंत्री चौ. ख्यालीसिंह की अंदरूनी मेहनत का असर तब दिखा जब 29 अक्टूबर 1946 को प्रजा परिषद् की बैठक हुई। इस में शामिल जाट समुदाय के लोगों ने रघुवरदयाल गोईल का पुरजोर विरोध किया और गोईल को प्रजा परिषद् के अध्यक्ष पद से हटाने पर आमादा दिखे। सरकार की कोशिश आंशिक तौर पर कामयाब हुई और प्रजा परिषद् दो फाड़ हो गयी। इसीलिए इस बैठक में शामिल लोगों का यहां नामोल्लेख करना जरूरी हो गया। बैठक में रघुवरदयाल गोईल, गंगादास कौशिक, मूलचन्द पारीक, वैद्य मघाराम, भिक्षालाल बोहरा, स्वामी सच्चिदानन्द, बछराज सुराणा, अमीचन्द, हरीशचन्द, हरिसिंह, वैद्य जीवनदत्त, हरदत्त सिंह, रामकिशन (पीलीबंगा), बृजलाल वकील, जयचन्दलाल वकील, डॉ. लालसिंह, अध्यापक गौरीशंकर आचार्य, चौ. दीपचन्द, चौ. मनफूल, कन्हैयालाल, हंसराज, गौरीशंकर नोहरवाले, स्वामी कर्मानन्द, ज्ञानीराम, महावीर हिसारिया, जोगी मायानाथ, चंदगीराम, परमेश्वरी लाल (चूरू), अखाराम शर्मा (डूंगरगढ़), रामप्रताप मूंधड़ा (डूंगरगढ़), गोपीचन्द (भादरा), मोहरसिंह (चांद गोठी) और रामेश्वरसिंह (नाभा स्टेट) आदि शामिल थे।

आजादी के इतिहास में बीकानेर के नाम एक और लोमहर्षक कांड दर्ज है। रतनगढ़ तहसील में जाटों के 'कडीड' गोत्र द्वारा बसाया एक गांव है कांगड़। 1946 . में जिसके कुल 135 घरों में 90 घर जाटों के थे। गांव के जागीरदार गोपसिंह 'पोलो' के अच्छे खिलाड़ी थे, इसीलिए गंगासिंह के चित्त चढ़े हुए थे। वे लम्बे समय तक गंगासिंह के एडीसी रहे और उनके पुत्र जसवंतसिंह ने सादुलसिंह के राज में अपनी पहुंच के चलते जागीरदारी लगान केवल ढाई गुणा कर दिया बल्कि प्रति हल 'लाग' भी 10 रुपये कर दी। जागीरदार यहीं नहीं धापे और कई नये कर और लाद कर न्यूनतम 85 रुपये का बोझ प्रत्येक पर लाद दिया। कोढ़ में खाज यह कि उसी वर्ष अकाल भी पड़ गया। किसानों ने एक वर्ष का सब लगान माफ करने का अनुरोध किया पर गोपसिंह नहीं माने, ऐसे में किसानों का आक्रोश बढ़ना ही था। गोपसिंह पूरे लवाजमें के साथ वसूली के लिए गांव पहुंच गये, 27 अक्टूबर 1946 को आदेश कर दिया कि 'रकम भरो या मार खाओ' किसानों ने एक दिन की मुहलत मांगी और रात को 35 लोग महाराजा से मिलने बीकानेर गये। जब गोपसिंह को इसका पता लगा तो गुस्से में अपने साथ आये लगभग 250 जनों को गांव लूटने का आदेश दे दिया, फिर क्या, जहां-जिसको-जो मिला ले आए। औरतों के साथ बदसलूकी भी की गई। घायल लोग अस्पताल पहुंचे तो इलाज नहीं किया गया। थाने गये तो रिपोर्ट नहीं लिखी गयी। गोपसिंह गढ़ फतेह करने जैसी गर्वोक्ति के साथ बीकानेर लौट आये। 

उधर बीकानेर आये उन 35 पीड़ितों की कहीं सुनवाई नहीं हो रही थी। इस पर महाराजा को लोकल तार दिया गया, जिसका कोई उत्तर नहीं मिला। सुबह महाराजा शिवबाड़ी क्षेत्र में घूमने आते थेसभी पीड़ित वहां पहुंच गये। महाराजा के पांव पकड़े तो उन्हें लालगढ़ बुला लिया। लालगढ़ पहुंचे तो गृहमंत्री प्रतापसिंह ने यह कह कर दुत्कार दिया कि तुम तो प्रजा परिषद् के हो, उसी के पास जाओ। तब तक पीड़ितों को प्रजा परिषद् की सूझी भी नहीं थी, लेकिन प्रतापसिंह ने सूझा दी।

वे पहुंच गये प्रजा परिषद् के कार्यालय, उसी दिन केन्द्रीय कार्यालय में सक्रिय कार्यकर्ता सम्मेलन चल रहा था। गोईल ने उनकी पूरी व्यथा सुनी और जांच के लिए सात लोगों की कमेटी बना दी जो पूरे वाकिये की जांच कर रिपोर्ट देंगे। ये सात थे स्वामी सच्चिदानन्द, हंसराज आर्य (भादरा), गंगादत्त रंगा, मास्टर दीपचन्द (राजगढ़), मौजीराम (चांदगोटी), प्रो. केदार शर्मा और चौधरी रूपाराम (राजगढ़) ये सभी 31 अक्टूबर, 1946 को कांगड़ गये। स्थितियां भयंकर थीं। रास्ते में ही इन्हें डराया जाने लगा कि यह गोपसिंह का इलाका है, मत जाओ। फिर भी 1 नवम्बर को वे कांगड़ पहुंच गये। सच में गोपसिंह का वहां बड़ा आतंक था। कोई भी मुंह खोलने को तैयार नहीं। गांव में मुरदिनी छायी हुई थी। इसी दौरान गोपसिंह के लोगजिनके पास लाठी और तलवारें थींने आकर उक्त सातों को घेर लिया। गढ़ में ले जाकर ठाकर के सामने पेश किया। तलाशी हुई, जो भी पास था छीन लिया। अलग-अलग कोठरियों में सातों को बन्द कर बेरहमी से पीटा गया। दूसरे दिन भी यही सिलसिला जारी रहा। जितनी यातनाएं इन दो दिनों में इन्हें दी गयी वह लोमहर्षक थी। शराब में धुत गोपसिंह औरतें नचवा रहे थे। पहले दिन अधमरा करके सातों को गढ़ से निकाल दिया गया, दूसरे दिन उन्हें फिर वहीं लाया गया और वही वाकिया फिर दोहराया गया। तीसरे दिन जब छोड़ा तो डॉक्टरों ने इलाज करने से मना कर दिया और थानेदार ने रिपोर्ट लिखने से। 3 नवम्बर 1946 को तार द्वारा इस सबकी सूचना महाराजा सादुलसिंह को दी गई। मगर ढाक के वही तीन पात। 

अखबारों ने इस घटना को विस्तार से छापा। प्रधानमंत्री पणिकर प्रशासन को लिखते रहे कि मुझे असलियत से अवगत करवाया जाये। जब कोई गवाह बनने को तैयार नहीं हो तो प्रशासन रिपोर्ट कहां से दे। यह थी सादुलसिंह के राज में जुल्म की पराकाष्ठा। महाराजा सादुलसिंह हमेशा जागीरदारों के साथ रहे और जनता के साथ झूठी सहानुभूति दिखा कर बेवकूफ बनाते रहे। इतना ही नहीं, वे 1947 तक जागीरदारों के पक्ष में अपने नाम से मुनादियां करवाते रहे। इसकी बानगी में मार्च 1947 में महाराजा सादुलसिंह के एक आदेश का मजमून देख सकते हैं।

'श्रीजी साहब ठाकुर की सरकार यह आज्ञा देती है कि कई जागीरदारों के गांव आसामियान (यानी किसानगण)' अपने खेतों में जागीरदारों को दरख्त (पेड़) काटने से रोकते हैं, मना करते हैंयह ठीक नहीं है। अत: निर्देशित किया जाता है कि जागीरदार लोग अपनी-अपनी जागीरों के अन्दर अपने निजी काम के लिए किसानों के खेतों से जितने आवश्यक हों, उतने पेड़ काट सकते हैं।'

दीपचंद सांखला

13 अक्टूबर, 2022

Thursday, October 6, 2022

बीकानेर : स्थापना से आजादी तक-22

 सरकार रोज नये पैंतरे लाती और हर बार मुंह की खाती। इस बार दुस्साहस किया स्वामी कर्मानन्द को बरगलाने का। सादुलसिंह ने एक बड़े अफसर को भेज कर कहलवाया कि आप बनिये (रघुवरदयाल गोईल) का साथ छोड़ दें तो जाटों के लिए आप जैसा कहेंगे वैसा करने को सरकार तैयार है। लेकिन स्वामी ने चतुराई से रणनीतिक उत्तर देकर उस अधिकारी को लौटा दिया। यह वाकिया प्रजा परिषद् के अलवर कार्यालय का था, जहां दाऊदयाल भी उपस्थित थे। उन्होंने यह पूरा संवाद छिप कर सुन लिया था। 

रघुवरदयाल गोईल की जेल में भूख-हड़ताल को 10 दिन हो गये थे। उनका स्वास्थ्य लगातार गिर रहा था। उसी दिन स्वामी कर्मानन्द ने रियासत के प्रधानमंत्री के नाम तार दिया जिसमें संतुलित चेतावनी के साथ आगाह किया गया कि श्री गोईल को कुछ हुआ तो हम कैसे भी बलिदान से पीछे नहीं हटेंगे। तार मिलने के पांचवें दिन 13 जुलाई को सरकार ने गोईल की सभी बातें मान ली और गोईल वैद्य मघाराम को राजनीतिक कैदी का दर्जा दे दिया। गोईल ने भी भूख-हड़ताल समाप्त कर दी।

22 जुलाई, 1946 . को प्रजा परिषद् का स्थापना दिवस था, तिरंगे पर सरकार के रुख और दमन की मंशा के बावजूद स्वामी कर्मानन्द ने तय कर लिया कि इस बार का स्थापना दिवस राजगढ़ में बड़े स्तर पर मनाया जायेगा। सभी जगह पर सूचना भेज दी गई। लोगों में भारी उत्साह था। दूसरी ओर सरकार ने भी कमर कस रखी थी। 19 जुलाई को ही रियासत में धारा 144 लागू कर दी गई। रियासत के रेवेन्यू कमिश्नर आईजीपी के साथ 21 जुलाई को फौज और पुलिस के भारी जाब्ते सहित राजगढ़ में डटे। आसपास के लोगबाग भी 21 जुलाई से ही राजगढ़ पहुंचने लगे। कस्बे में भारी तनाव, अनेक तरह की आशंकाएं।

यहां जैसा कि खुद दाऊदयाल आचार्य बताते हैं कि उनका धैर्य और सूझबूझ काम आया। वे स्वामी कर्मानन्द को 21 जुलाई की रात इसके लिए तैयार करने में कामयाब रहे कि आयोजन खुले मैदान में करके चारदीवारी वाले किसी बाड़े में किया जाए, ताकि धारा 144 का भी उल्लंघन हो और आयोजन भी शान्ति से निबट जाये। लोगों से कहलवा दिया कि चार-चार से बड़े समूह में आये। उक्त आदेशों को लोगों ने माना भी। सेठ टीकमचन्द की धर्मशाला में आयोजन करना तय किया जिसकी चारदीवारी में बड़ा मैदान भी था। अधिवेशन की अध्यक्षता करने कांग्रेस ने दिल्ली कांग्रेस अध्यक्ष हकीम खलीलुल रहमान आए। अनेक नेताओं के साथ हकीमजी और एक नये नेता मास्टर गौरीशंकर आचार्य का भी ओजस्वी भाषण हुआ। प्रशासन ने भी संयम बरता और राजगढ़ का आयोजन शान्तिपूर्वक निबट गया।

लेकिन गोईल की भूख-हड़ताल के बावजूद जेलों में बन्द अन्य सेनानियों का दमन जारी था। चौ. हनुमानसिंह को 23 जून से भूख-हड़ताल करनी पड़ी। इसी दौरान जेल में बन्द हीरालाल शर्मा भी भारी दमन के शिकार हो रहे थे।

इसी बीच सरकार ने अचानक यू टर्न लेते हुए 27 जुलाई 1946 . को सभी राजनीति बन्दियों को छोड़ दिया। यों लगा कि ऐसा केन्द्रीय स्तर पर हो रहे परिवर्तनों के चलते हो रहा है, लेकिन ऐसा था नहीं। सरकार के इस निर्णय का सभी ओर से स्वागत हुआ। छोड़े जाने वालों में रघुवरदयाल गोईल, चौधरी हनुमानसिंह, चौ. कुंभाराम, वैद्य मघाराम, गणपतसिंह, किशनलाल गुट्टड़, और रामनारायण बधुड़ा थे। लेकिन एक हीरालाल शर्मा को नहीं छोड़ा गया।

सरकार ने रस्म-अदायगी के तौर पर ही सही, उत्तरदायी शासन की घोषणा तो कर दी लेकिन अन्दरखाने 'फूट डालो और राज करो' षड्यंत्र में लगी रही। रस्म अदायगी के तौर मंत्रिमंडल का गठन किया गया जिसमें चौ. ख्यालीसिंह को लोकप्रिय मिनिस्टर के तौर पर ग्राम सुधार मंत्री बनाया तो बनिया वर्ग को खुश करने के लिए संतोषचन्द बरड़िया को स्वायत्त शासन मंत्री का पद दे दिया। इन्हीं के माध्यम से प्रजा परिषद् के समान्तर 'बीकानेर राज्य प्रजा परिषद् सेवक संघ' जैसे संगठन पूरी रियासत में बनवा दिये। और तिरंगे के समान्तर केसरिया और कसूमल—इन दो रंगों का रियासत का झंडा सादुलसिंह ने तैयार करवाया और अपने कठपुतली संगठनों के माध्यम से उसे प्रचारित करना शुरू करवा दिया। (मतलब बीकानेर रियासत का झंडा जुलाई 1946 ई. के बाद ही बना है।)

भारत छोड़ो आन्दोलन दिवस 9 अगस्त 1942 के बाद से देशभर में बलिदान दिवस के तौर पर मनाया जाने लगा था। बीकानेर रियासत के स्वतंत्रता सेनानियों ने यह दिवस गंगानगर में मनाना तय किया। जिसमें 1942 . के सेनानियों के बलिदान के साथ बीकानेर रियासत के शहीद बीरबल को भी याद किया गया। दो दिन का यह सम्मेलन शानदार और शान्तिपूर्वक निबटा जिसको संबोधित करने के लिए पटियाला से सरदार हरचरणसिंह और चौटाला से चौधरी देवीलाल (बाद में हरियाणा के मुख्यमंत्री और देश के उप प्रधानमंत्री बने) आये। सम्मेलन के मंच से मंत्री अमरसिंह ने आगंतुकों का स्वागत करते हुए सरकार की करतूतों का बड़े चुटिले अंदाज में वर्णन किया और शासन को उघाड़ कर रख दिया। उन्होंने हीरालाल शर्मा को छोड़े जाने का भी उल्लेख किया। गोईल ने सरकार द्वारा रियासत में साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने की उदाहरण देकर आलोचना की। वहीं इसी 9 अगस्त को चूरू में तिरंगाविहीन जुलूस पर लाठियां बरसाई गयीं। इसी दौरान मंत्री चौधरी ख्यालीसिंह जाटों को बांटने के लिए रेल द्वारा पूरी रियासत के दौरे पर निकले लेकिन उन्हें कोई सफलता नहीं मिली। कहीं-कहीं तो भारी विरोध का सामना करना पड़ा जिसके कारण दौरे को बीच में ही रद्द कर उन्हें बीकानेर लौट आना पड़ा। क्रमशः...

दीपचंद सांखला

6 अक्टूबर, 2022