Saturday, November 10, 2018

नोखा के वार्ड नं. 29 के बहाने स्थानीय राजनीति की पड़ताल (2 जनवरी, 2012)

अकसर देखा गया है कि ऐसी अधिकांश सार्वजनिक समस्याएं जिनको आम विरोध और आक्रोश का मुद्दा बना लिया जाता है उनकी तह में कारण निजी होते हैं। पिछले तीसेक सालों में तो ऐसा ढिठाई के साथ होने लगा है। अब ऐसे अवसर कम देखने को मिलते हैं कि कोई मुद्दा व्यापक सार्वजनिक हित का हो जिसे लेकर संगठित और व्यवस्थित विरोध दर्ज करवाया जाता हो।
दबंग और प्रभावशालियों के हितों को ही सार्वजनिक रंग दे दिया जाता है और दबंग और प्रभावशाली इस सार्वजनिक रंग की ओट में अपना हित साध लेते हैं। यह भी कि ये दबंग और प्रभावशाली ही राजनीति करने लगे हैं या यह राजनीति करने वाले दबंगई, इन दोनों के बीच फर्क इतना झीना होता है कि उसे पहचान पाना बड़ा मुश्किल हो गया। बड़े हितसाधक इन तथाकथित नेताओं को लोकतंत्र में सिर गिनाने होते हैं और छोटे-मोटे स्वार्थों की पूर्ति के बदले उन्हें यह सिर मिल भी जाते हैं। वहीं छोटे हितसाधक अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति के चलते इन दबंग-नेताओं के सक्रिय समर्थकों की गिनती में अपने को शुमार कर लेते हैं। इस तरह इन सबके अपने-अपने हित ‘सार्वजनिक हित’ में परिवर्तित हो जाते हैं और ऐसे ही ‘सार्वजनिक हितों’ को पूरा करने को मजबूर प्रशासन को अकसर देखा जाता रहा है।
कहते हैं नोखा का सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट का मामला इसलिए गंभीर हो गया है कि इसमें जोड़ के दो नेताओं के हित-टकरा रहे हैं। दोनों ही प्रभावशाली समूह हैं, न केवल प्रभावशाली बल्कि  उनमें से एक समूह के मुखिया रामेश्वर डूडी तो लगभग घायल शेर की भूमिका में दिखाई देने लगे हैं। पहले वो विधान सभा का चुनाव हार गये और अब उनकी खुद की पार्टी की सरकार में उनको हराने वाले निर्दलीय विधायक कन्हैयालाल झंवर लालबत्ती की गाड़ी जो ले बैठे।
कल ही एक निजी कार्यक्रम में नोखा से नुमाइंदगी कर चुके और विधानसभा की आरक्षित सीटों में बदलाव के चलते अपने नेताई क्षेत्र को बदलने वाले गोविंद मेघवाल से जब ट्रीटमेंट प्लांट मुद्दे पर उनकी राय जाननी चाही तो उन्होंने बहुत सफाई से यह कहते हुए पल्ला झाड़ लिया कि दो कोलोनाइजरों की लड़ाई में बेचारी जनता परेशान हो रही है, इसीलिए वे इस मुद्दे पर बोलना उचित नहीं समझते हैं। आप गौर करेंगे इस वाक्य पर ‘बेचारी जनता परेशान हो रही है।’ यानी असल परेशानी जनता की है, इसलिए सार्वजनिक मुद्दा हुआ जनता की परेशानी, लेकिन इस असल सार्वजनिक मुद्दे पर कोई बोलना नहीं चाहता है। विडम्बना देखें उन जोड़ के दो नेताओं के हितसाधकों में से एक जनता की परेशानी की बात भी कर रहा है, उसे भी लोग यह कहकर भाव नहीं दे रहे हैं कि उनके भी इसमें अपने निजी हित हैं।
-- दीपचंद सांखला
02 जनवरी, 2012

Saturday, November 3, 2018

दिन महीने साल....(31 दिसंबर, 2011)

आज 31 दिसम्बर है यदि इसमें 2011 ना जोड़ें तो यह तारीख कोई बहुत उल्लेखनीय नहीं रह जाती है--तीन वर्ष लगातार 365वां दिन और चौथे अधिवर्ष (लीपईयर) का 366वां दिन 31 दिसम्बर होता ही है।
वैसे यह तारीखें, वार और साल समय की गणना के लिए बने हैं। समय-समय पर इनकी गणना में परिवर्तन भी होते रहे हैं। आज भी हो रहे हैं जैसे खबर है कि प्रशान्त महासागर स्थित दो देश समोआ और तोकेलाउ ने अपना 2011 का यह वर्ष 364 दिन का कर लिया। कहा जा रहा है कि उन्हें अपने पड़ोसियों से समय गणना की जुगलबन्दी के लिए ऐसा करना जरूरी था।
पिछली सदी के आखिरी दो दशकों में टीवी-अखबारों ने 21वीं सदी की इतनी धूम मचा रखी कि लगने लगा था कि 1 जनवरी, 2001 को पूरे ब्रह्माण्ड में कुछ अद्भुत घटित होगा। 1984 में जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने तो सारी योजनाओं में 21वीं सदी की उम्मीदों का उल्लेख इस तरह होने लगा कि जैसे कुछ तिलिस्म घटित होने वाला है। लेकिन 2 जनवरी 2001 के सूर्योदय के साथ ही वो उम्मीदे भ्रम में रूपान्तरित होती देखी गई और भ्रम भी ऐसा कि हर कोई 21वीं सदी के लेबल से चस्पा अपनी उम्मीदों को कुछ इस तरह भूलता देखा गया कि उसने कभी वो उम्मीदें की ही नहीं थी!
कुछ-कुछ वैसा ही या कहें कि उसका संक्षिप्त संस्करण हर वर्ष इन्हीं दिनों देखने को मिल जाता है। पिछले तीसेक वर्षों से तो इस भ्रम की खुमारी कुछ ज्यादा ही देखी जा सकती है। आर्थिक उदारीकरण से रोशन और बाजार से पोषित हमारे टीवी और अखबार केवल नये वर्ष को ही नहीं लगभग सभी त्योहारों को कुछ इस तरह से महत्त्व देने लगे हैं कि किसी भी तरीके से ही सही उनके पोषक यह बाजार परवान पर रहें।
मौसम साफ हो और आप एक ही स्थान से देखें तो 31 दिसम्बर के सूर्योदय से 1 जनवरी का सूर्योदय थोड़ा और उत्तर से होगा? बस यही और इतना ही खगोलीय अंतर है नये और पुराने साल में।
देखा जाय तो दिन, महीने, साल का भान रखने वाले या भान रखने को मजबूर देश की लगभग आधी ही आबादी है। बाकी की आधी आबादी को तो दिन, महीने, साल की गणना की न तो जरूरत है और ना ही उनकी कोई मजबूरी। उन्हें तो सूरज के उदय और अस्त या अस्त और उदय के बीच ही अपनी रोटी का जुगाड़ तथा थकान को उतारने की व्यवस्था करनी है। उनके लिए इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ता की ईस्वी सन्, हिजरी सन्, विक्रम संवत्, वीर संवत् और शक संवत् कब शुरू होता है और कब खत्म होता है। गालिब के हवाले से कहें तो मन को बहलाने को यह ख्याल अच्छे हैं, बस इस मन को बहलाने का अवकाश और सामर्थ्य--दोनों आपके पास हों।
--दीपचंद सांखला
31 दिसम्बर, 2011

ढलान पर अन्ना आंदोलन (30 दिसंबर, 2011)

जनलोकपाल बिल को लेकर अन्ना के तीसरे दौर का अनशन शुरू होने के स्थान, समय और अवधि तीनों पर असमंजस बना रहा और अंततः 27 दिसंबर से तीन दिन के लिए मुम्बई में शुरू हुआ!
लेकिन दूसरे ही दिन अन्ना मंच पर लगभग उखड़े देखे गये। कारणों में अन्ना का स्वस्थ न होना और आमजन में अगस्त वाला उत्साह ना होना माने गये। मृत्यु से न डरने की बात करने वाले अन्ना स्वास्थ्य कारणों से धैर्य खो बैठेंगे इसकी उम्मीद नहीं थी। आमजन के उत्साह की कमी ही मुख्य कारण माना जा सकता है। अवाम में उत्साह में कमी का बड़ा कारण टीम अन्ना को माना जा सकता है। कांग्रेस लगातार यह साबित करने में लगी रही कि टीम अन्ना खुद भी दूध की धुली नहीं है और इसमें सफल भी होती दिखती है। कांग्रेस ने योजनाबद्ध तरीके से किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल के पुराने मामलों को उघाड़ा। इसीलिए गांधी शुद्ध साध्यों के साथ सार्वजनिक जीवन में काम करने वालों का जीवन साफ-सुथरा होने पर जोर देते हैं। गांधी को अपने शुरुवाती जीवन में कुछ कमियां महसूस होती थीं जिनका निर्मल मन से उल्लेख उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय होने से पहले लिखी अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में किया है। इसीलिए पिछले जीवन को लेकर कोई आरोप उन पर नहीं लगे। गांधी ने अपनी आत्मकथा में कुछ ऐसी स्वीकारोक्तियां की, जिनके बारे में उनके अलावा किसी को पता नहीं था। इसलिए शासकों और अन्यों को तो क्या स्वयं गांधी के अपने मन को भी अपने पर अंगुली उठाने का मौका नहीं मिला। किरण बेदी और अरविन्द केजरीवाल को गांधी की यह सीख लेनी चाहिए थी। बल्कि इन दोनों का मामला तो और भी गंभीर था। उन पर अभी तक जो भी आरोप लगे वे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होने के बाद के हैं।
स्वयं अन्ना का वैचारिक आधार कमजोर था इसलिए निर्णय की उनकी निर्भरता अपने विश्वसनीयों पर रही। और विश्वसनीयों में मुखर किरण और अरविन्द की जनलोकपाल बिल के ड्राफ्ट से टस से मस न होने की हेकड़ी थी या ‘मैं तो वही खिलौना लूंगा’ जैसा बालहठ, अभी समझना बाकी है। फिर हिसार उपचुनाव में कांग्रेस विरोध जैसे शॉर्टकट अपनाने से भी उनकी विश्वसनीयता कम हुई।
इस आन्दोलन पर पूर्व के अपने आलेखों में उठायी गयीं बातें और शंकाएं निर्मूल नहीं थी। बानगी के लिए तीन उद्धरण्--
-- लोकपाल बिल पर बनी संयुक्त कमेटी में सरकार की ओर से शामिल नेताओं की अफसराना हेकड़ी और सिविल सोसायटी के नुमाइंदों के अड़ियल रुख के चलते बात बनते-बनते ना बनी। दोनों पक्षों को समझना चाहिए कि व्यावहारिक और भ्रष्टाचार विरोधी लोकपाल बिल का लागू होना समय और लोक की पुरजोर इच्छा है और ऐसा दृढ़ इच्छाशक्ति से सम्भव भी है।                   
(22 अगस्त 2011)
-- जनलोकपाल बिल के लिए चल रहा आन्दोलन जो असल में भ्रष्टाचार के खिलाफ आन्दोलन है --आज अन्धेरे चौराहे पर खड़ा नजर आ रहा है। दरअसल एक लोकतान्त्रिक व्यवस्था में आप उस व्यवस्था के अन्दर जो कुछ सम्भव हो सकता है उससे ज्यादा की उम्मीद करना विफलता को निमन्त्रण देना है। टीम अन्ना में ऐसी सोच रखने वाले स्वामी अग्निवेश को टीम ने किनारे कर दिया है--बड़े पैमाने पर मिल रहे जन समर्थन से शायद टीम अन्ना के नीतिनिर्धारक यह भूल रहे हैं कि हम जिनके खिलाफ लड़ रहे हैं वो चाहे कितने भी भ्रष्ट हों, आये तो लोकतान्त्रिक तरीके से चुन कर ही हैं। अलावा इसके हर निर्णय की एक प्रक्रिया भी तय है। टीम अन्ना को इस तरफ भी विचार करना चाहिए। अन्यथा जन-सैलाब यदि निराश होगा तो बड़ी जिम्मेदारी टीम अन्ना की भी मानी जायेगी।               
(25 अगस्त 2011)
-- अन्ना टीम की महत्त्वपूर्ण सदस्य किरण बेदी ने कल मंच पर जिस तरह का दृश्य उत्पन्न किया वह निराशा और कुंठा की उपज थी--ऐसी निराशा और कुण्ठा तभी उपजती है जब आप अतार्किक उम्मीदों पर अड़े रहते हैं। टीम अन्ना में तर्कों से बात करने वाले जस्टिस संतोष एम हेगड़े और स्वामी अग्निवेश लगभग अलग-थलग हो गये हैं। अन्ना खुद निर्मलमन और मासूमियत लिए तो लगते हैं लेकिन किसी भी बड़े आन्दोलन को नेतृत्व देने वाले का वैचारिक आधार पुख्ता होना जरूरी होता है अन्यथा उसके बिखरने के खतरे बने रहते हैं। महात्मा गांधी और जयप्रकाश नारायण इसके उदाहरण हैं, जिनके अपने वैचारिक आधार थे। यदि ऐसा होता तो अन्ना टीम के चेहरों पर निराशा और व्यवहार--बोलचाल में कुण्ठा नहीं आती।    (27 अगस्त 2011)
--दीपचंद सांखला
30 दिसम्बर, 2011

खान-मजदूरों के हित और सुरक्षा दोनों राम-भरोसे (29 दिसंबर, 2011)

समुचित सुरक्षा प्रबंधों और पर्याप्त प्रशिक्षण के अभाव में खानों में काम करने वाले मजदूर एक ओर आए दिन दुर्घटनाओं के शिकार होते रहते हैं वहीं उनके स्वास्थ्य के साथ निरंतर खिलवाड़ होता रहा है। नतीजतन या तो इन मजदूरों की हादसों में मौत अथवा सिलिकोसिस जैसी बीमारियों के कारण जवानी में ही उनके काम करने की क्षमता घटने से उन पर निर्भर परिजनों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो जाता है। खान मजदूर सुरक्षा अभियान के प्रबंध न्यासी राना सेनगुप्ता ने प्रेस वार्ता के दौरान प्रदेश की खानों और इनमें काम करने वाले मजदूरों की जो तसवीर पेश की है वह वास्तव में भयावह है। प्रदेश में वैध खानों के साथ ही अवैध खानें भी बड़ी संख्या में संचालित की जा रही हैं। अधिकांश खानों में सुरक्षा प्रबंध खान मालिकों की प्राथमिकता में नहीं आते। कार्यरत मजदूरों के रिकार्ड का भी ठीक तरह से संधारण नहीं होता। बड़ी बात है कि कम पढ़े-लिखे मजदूरों को नियम-कायदों की भी जानकारी नहीं होती। फलतः खान दुर्घटनाओं के अधिकांश मामले रिकार्ड में नहीं आ पाते। कहीं दुर्घटना पीड़ित मजदूर के साथी अथवा परिजन कुछ विरोध दर्ज करवाते भी हैं तो नाममात्र का मुआवजा देकर प्रबंधन अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। अधिकांश मजदूरों को यह पता ही नहीं होता कि मुआवजे के भी नियम बने हुए हैं जिनका वे लाभ उठा सकते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सरकार ने इन मजदूरों के लिए खान सुरक्षा विभाग बना रखा है लेकिन विभाग ज्यादातर मजूदरों तक पहुंचता ही नहीं। उधर अपनी रोजी कमाने में ही जिन्दगी गुजारने वाले खान मजदूर को इस विभाग के  अस्तित्व की ही जानकारी नहीं होती। विभाग भी खान सुरक्षा सप्ताह मनाकर अपने कर्तव्य का निर्वाह मान लेता है।
प्रदेश में 25 लाख मजदूर सीधे तौर पर खानों से जुड़े हैं। मजदूरों का इतना बड़ा तबका होते हुए भी इनके हित-संरक्षण के समुचित उपाय नहीं हुए। बीकानेर संभाग में भी खनन उद्योग महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। आए दिन इन खानों में दुर्घटनाएं होती रहती हैं। कभी-कभार ये मामले पुलिस तक पहुंचते हैं लेकिन हाल के वर्षों में किसी खान मालिक को सुरक्षा उपायों की खामियों के चलते दंडित करने का मामला सामने नहीं आया। खान मजदूर सुरक्षा अभियान तो मजदूरों को उनके अधिकारों के प्रति जाग्रत करने के काम में जुटा हुआ है ही, खान सुरक्षा विभाग की भी यह जिम्मेदारी है कि वह सुरक्षा सप्ताहों की औपचारिकता पूरी करने के बजाय खान मजदूरों की सुरक्षा के साथ-साथ उनके लिए सुरक्षित रोजगार को सुनिश्चित करने और काम की परिस्थितियों को अहानिकारक बनाने में ठोस भूमिका निभाए। दुर्घटना होने पर पीड़ित पक्ष को समुचित मुआवजा दिलाने की दिशा में भी कारगर कदम उठाए जाने चाहिए।
--दीपचंद सांखला
29 दिसम्बर, 2011

डॉक्टरों की हड़ताल : टकराव का रास्ता टालने की जरूरत (28 दिसंबर, 2011)

प्रदेश के सेवारत चिकित्सकों की हड़ताल को आठ दिन हो गए हैं। तमाम वैकल्पिक उपायों के बावजूद चिकित्सा सेवाओं की लगभग ठप हो चुकी स्थिति किसी से छुपी नहीं है। ऐसे हालात में टकराव का रास्ता छोड़कर बातचीत से इस गतिरोध को तोड़ने के सार्थक प्रयास होने चाहिए। चिकित्सकों की मांगें चाहे कितनी भी जायज हों, तर्कसंगत हों पर उन्हें भी समझना चाहिए कि उन्हें ‘भगवान’ का दर्जा देने वाली जनता का मूड तेजी से बदल रहा है। अपने रोगी को लेकर सरकारी अस्पताल में पहुंचने वाले परिजनों को इसके आगे कुछ दिखाई नहीं देता कि उन्हें समुचित चिकित्सा सुविधा मिले। जब ऐसा नहीं होता तो उनकी निराशा का आक्रोश हड़ताली चिकित्सकों पर फूटता है। इसका ही नतीजा है कि कहीं चिकित्सक हड़ताल के खिलाफ बाजार बंद किए जा रहे हैं तो कहीं हदों से बाहर जाकर चिकित्सकों के घर तोड़-फोड़ की घटनाएं हो रही हैं। लगातार गिरफ्तारियों और ‘रेस्मा’ के तहत कानूनी कार्रवाइयों का दबाव भी चिकित्सकों का मनोबल गिराने में भूमिका निभा रहा है। अड़तालीस घंटे से अधिक समय तक गिरफ्तार रहने वाले चिकित्सकों के निलंबन की कार्रवाई भी अमल में लाई जा रही है। इसी कारण कई गिरफ्तार चिकित्सक अब जमानत का रास्ता अपनाने लगे हैं। हो सकता है कि तथाकथित ‘दमनात्मक’ कार्रवाई से देर-सबेर अधिकांश हड़ताली चिकित्सक काम पर लौट आएं और चिकित्सा सेवाएं सामान्य होने लगें। इस तरह कुंठित मानसिकता में काम पर लौटे चिकित्सकों से किस तरह की सेवा भावना की अपेक्षा की जा सकती है? चिकित्सा सेवाओं को पुनः सुचारू करने के लिए अच्छा तो यही होगा कि राज्य सरकार को टकराव की नीति को त्यागते हुए ‘जनता का गुस्सा फूटने’ जैसे उकसाने वाले बयानों तथा बार-बार डॉक्टरों की शपथ का हवाला देने के बजाय खुलेमन से बातचीत के लिए आगे आना चाहिए। डॉक्टर को राज्य सेवा का चाहे कितना ही ‘इलीट’ वर्ग माना जाए लेकिन हैं तो वे भी सरकार के कर्मचारी, और इस नाते कर्मचारियों के अन्य वर्गों अथवा पड़ोसी राज्यों के चिकित्सकों से वेतन-सेवा शर्तों की तुलना के आधार पर अपनी मांग रखना अनुचित कैसे माना जा सकता है। राज्य सरकार तो अब हड़ताल खत्म होने पर वार्ता की बात कहने लगी है। लोकतंत्र में बातचीत का रास्ता बंद करना कहां तक उचित है। जनता को हो रही तकलीफों से निजात दिलाना सरकार का कर्तव्य है तो अपने ही वेतनभोगियों की न्यायसंगत मांगों पर भी उसे ही विचार करना है। अतः सरकार को गतिरोध समाप्त करते हुए टकराव का रास्ता त्यागकर बातचीत से समस्या का समाधान निकालना चाहिए।
--दीपचंद सांखला
28 दिसम्बर, 2011

ऐसे बयानों के मानी (27 दिसंबर, 2011)

डॉक्टरों की हड़ताल पर मुख्यमंत्री का बयान आया है जिसमें वे कह रहे हैं कि ‘जनता ने कानून हाथ में लिया तो डॉक्टरों का घर से निकलना मुश्किल हो जाएगा।’ उन्होंने यह भी कहा कि डॉक्टरों की हड़ताल से कानून व्यवस्था बिगड़ने की पूरी आशंका है। इन बयानों से गहलोत की खीज जाहिर हो रही है। वे जो आशंका जाहिर कर रहे हैं उसके लिए आम-अवाम में एक अलग तरह के आवेश की जरूरत होती है। अगर उस तरह का आवेश जनता में होता तो केवल डॉक्टरों के खिलाफ ही क्यों फिर जहां कहीं भी कुछ गलत हो रहा दिखता, वो अपनी प्रतिक्रिया देती। तब गहलोत का यह बयान सच भी हो सकता है जिसमें उन्होंने कानून व्यवस्था बिगड़ने की आशंकाई धमकी दी। सच हुई आशंक खतरनाक भी हो सकती है।
मुख्यमंत्री के उक्त बयानों का एक मतलब यह भी निकाला जा सकता है कि वे जनता को उकसा रहे हैं कि आप ऐसा करो--अगर उनकी यही मंशा है तो वो और भी खतरनाक है।
उक्त बयान सुन कर एक घटना जरूर याद आ गई जो शुद्ध उपहास था। कृपया इसे मात्र योग ही मानें कि एक खीज भरे बयान पर उपहास की घटना याद आई है। 1977 के विधानसभा चुनावों की बात है--तब बीकानेर से कांग्रेस के उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ने का साहस गोकुलप्रसाद पुरोहित ने दिखलाया था। साहस इसलिए कि जैसा माहौल था उसमें कांग्रेस उम्मीदवार की हार तय थी। रतन बिहारी पार्क में कांग्रेस की चुनावी सभा को संजय गांधी को संबोधित करना था--जैसा कि होता है उनके आने में लगातार देर हो रही थी। पहले से लगभग उखड़ी-सी आमसभा और उखड़ने को थी--वक्ता हांफने लगे थे। तभी खुद गोकुलप्रसाद खड़े हुए, माइक सम्हाला और उन्होंने अपनी चिर-परिचित व्यंग्य और उपहास की भाषा का सहारा लिया। जनता पार्टी के किसी नेता के एक बयान का बहाना बनाया जिसमें कहा गया था कि कांग्रेसियों से वे अब सड़कों पर निपटेंगे। गोकुलप्रसाद ने इस बयान के आखिरी हिस्से--जिसमें सड़कों पर निपटने की बात कही गई--का उल्लेख करते हुए जवाब दिया कि अगर वे सड़कों पर गंदगी करेंगे तो जनता से वह पिटेंगे भी। पाठक जानते हैं कि इस निपटना शब्द का अर्थ फैसला करने के अलावा एक और भी होता है--शौच से निवृत्त होना।
गोकुलप्रसाद की 1967 के चुनावों की आमसभाओं में ऐसे ठठ्ठे और उपहास आम हुआ करते थे और अवाम से इस पर दाद भी मिलती थी लेकिन 1977 की उस सभा में अवाम का उत्साह नदारद था! गोकुलजी का वो ठठ्ठा फिस्स हो गया। देखना है कि गहलोत के कल के उक्त बयान को अवाम किस तरह लेगी।
--दीपचंद सांखला
27 दिसम्बर, 2011

ये सुर्खियां बटोरूं नुमाइंदे (26 दिसंबर, 2011)

रतन बिहारी पार्क क्षेत्र में कल जब सुलभ कॉम्पलेक्स का निर्माण कार्य शुरू हुआ तो कुछ लोगों ने विरोध करके रुकवा दिया। इससे पहले भी लगभग तीस वर्ष पूर्व जब इसी पार्क परिसर में सूचना केन्द्र और रंगमंच का निर्माण शुरू होने वाला था इसी तरह कुछ लोगों ने विरोध किया और मामले को न्यायालय में ले गये। अभी पिछले दिनों इसी पार्क परिसर में दोनों मन्दिर भवनों के पीछे स्थित मैदान में पार्किंग बनाने की घोषणा हुई तो फिर विरोध हुआ और मामले को न्यायालय में ले जाया गया।
आजादी के बाद से विकास का आदर्श जब शहरी विकास को ही मान लिया और गांवों से पलायन कर लोग-बाग शहरों में बसने लगे तो शहरों पर बोझ अंधाधुंध बढ़ने लगा है। ऐसे में यदि आवश्यक सेवाओं को उपलब्ध ना करवाया जाय तो भी परेशानी और अगर प्रशासन इसकी व्यवस्था करता है तो कुछ ऐसे लोग जिनके कुछ स्वार्थ भी हो सकते हैं या इन्हीं बहानों से सुर्खियों में रहना चाहते हैं--आड़े आ जाते हैं। यह कहने का मानी यह कतई नहीं है कि हमेशा ऐसा ही होता है--कई बार इस तरह के विरोध के सार्वजनिक हित के पुख्ता कारण भी हो सकते हैं, लेकिन देखा गया है कि ऐसा बहुत कम होता है कि किसी योजना या कार्य का विरोध व्यापक सार्वजनिक हित में किया गया हो।
रतन बिहारी पार्क परिसर के बहाने से बात करें तो उसमें पार्किंग का विरोध करने वाले उसके आस-पास कोई अन्य इतना बड़ा स्थान बता सकते हैं जहां पार्किंग बन सके। क्या वो इस बात की गारंटी लेते हैं कि भविष्य में इस स्थान का दुरुपयोग होने से रोक पायेंगे। इसी मैदान में कब्जे होने शुरू हो गये हैं, अनधिकृत रास्ते निकाल लिए गए हैं। लोग-बाग खुले में शौच करते हैं बल्कि सुना गया है मन्दिर परिसर के खांचों का उपयोग अनैतिक कार्यों के लिए भी किया जाता रहा है। विरोध करने वाले इस तरह के निर्माण में गुणवत्ता नहीं बरतने पर कितना विरोध करते हैं? या उन्होंने कभी इस तरह का विरोध किया है। क्या शहर में संचालित सुलभ शौचालयों में पर्याप्त सफाई या स्वच्छता का ध्यान रखा जाता है या तय शुल्क से ज्यादा पैसे तो नहीं लिए जा रहे हैं।
कल के विरोध का बड़ा कारण यह बताया गया कि दोनों तरफ मन्दिर हैं। जबकि प्रस्तावित सुलभ कॉम्पलेक्स मन्दिर परिसरों से पर्याप्त दूरी पर बनना है। क्या शहर के कई मन्दिर परिसरों में ही शौचालय नहीं बने हैं, इस तरह का विरोध करने वालों की असली मंशा क्या है? रतन बिहारी पार्क वर्षों से उजाड़ और दुर्दशा का शिकार है। इस पार्क परिसर का उपयोग जिस तरह से होने लगा है वो क्या सब उचित है। क्या इन विरोध करने वालों ने कभी इसकी दशा सुधारने का सकारात्मक प्रयास किया है--फिर चाहे वह औपचारिक भर ही हो। आम लोगों को इस तरह सुर्खियां बटोरू लोगों के साथ बिना सोचे-समझे नहीं खड़ा होना चाहिए।
टीवी-अखबारों से भी गुजारिश है कि वो ऐसी खबरों को सुर्खियां देने से पहले इसके अन्य पहलुओं पर भी विचार करें कि जब शहर बढ़ रहा है तो उसके लिए उपरोक्त तरह की सार्वजनिक सुविधाओं की जरूरतें भी बढ़ती हैं। सार्वजनिक मामलों में सकारात्मक सोच की जरूरत है।
--दीपचंद सांखला
26 दिसम्बर, 2011