मक्खन जोशी के बहाने बीडी कल्ला की बात
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कांग्रेस, प्रजा समाजवादी पार्टी (जनता पार्टी, जनता दल) होते हुए भारतीय जनता पार्टी तक पहुंचे लोकप्रिय मक्खन जोशी और उनके मामा के बेटे बीडी कल्ला की राजनीतिक प्रतिद्वंदिता के शहर में कई किस्से प्रचलित हैं।
आत्मविश्वास से परिपूर्ण मक्खन जोशी अपने स्कूटर पर अकेले ही घूमते, वहीं हीनभावना से ग्रसित कल्ला बिना दो-चार-छह समर्थकों आज भी बाहर नहीं निकलते। इसी बात पर कल्ला समर्थक इतरा कर कहने लग गये थे कि हमारे ’साब' इतने लोकप्रिय हैं कि दस-बीस लोग हमेशा उनके साथ रहते हैं, मक्खन के साथ कोई नहीं होता।
कला-साहित्य-संस्कृति में रुचि रखने वाले मक्खनजी कल्ला समर्थकों की उक्त बात को काउंटर अपनी आमसभाओं में यह कहकर करते थे कि 'सूर्डी (मादा सूअर) 100-100 बच्चे पैदा करके भी कीचड़ में लोटती रहती है, वहीं शेरनी दो-तीन पैदा करती है और शेर जंगल में अकेला ही घूमता है।
1972 से 1977 तक विधायक रह चुके राजनेता बहनोई गोपाल जोशी, फुफेरे मक्खन जोशी और राजनीति में सक्रिय अग्रज (भाईसा) जनार्दन कल्ला के क्रमशः रुतबे, लोकप्रियता और काम साध लेने की युक्ति से प्रभावित कल्ला के भीतर एक अफसर हमेशा से दुबका है। कॉलेज मेंं प्रध्यापकी के समय भी कल्लाजी अपनी उस हीनता से उबरने के लिए बहरूपिये की मानिंद हर सप्ताह कभी उद्बुदी पोशाक बदल कर तो कभी भिन्न तरह की दाढ़ी और मूछें तो कभी सफा-चट करवा कर आते।
अखबारों में नाम-फोटो छपवाने की लालसा कल्लाजी में तब भी थी, तब की कम गुंजाइश में भी NSS के आयोजनों के बहाने, तो कभी जेबी संस्थाएं बना कर विज्ञप्तियां बनवा ही लेते थे। ऐसी एक नवगठित संस्था 'बीकानेर उपभोक्ता मंच' में पदाधिकारी कल्लाजी का विद्यार्थी होने की वजह से मैं भी रहा।
1978 में इंदिरा गांधी की गिरफ्तारी के समय से कल्लाजी अपनी राजनीतिक सक्रियता बनाने लगे, कुछेक विद्यार्थियों-रिश्तेदारों संग छोटे-मोटे प्रदर्शन करने लगे। प्रध्यापकी वे निजी महाविद्यालय में करते थे, इसलिए ऐसा संभव भी था। तब उन्हें गंभीरता से खुद उनके 'भाईसा' ही नहीं लेते थे दूसरा कौन लेता। लेकिन स्थानीय अखबारों में कॉलम लिखने वाले कॉलेज के कुछ साथियों ने कल्लाजी का उल्लेख करना शुरू कर दिया, गांधी परिवार में दूर की पहुंच रखने वाले कश्मीरी पंडित प्राचार्य बढ़ावा देने लगे।
कॉलेज के साथियों और विद्यार्थियों के अलावा खुद के परिजन तक बुलाकीदासजी (बीडी कल्ला का पूरा नाम) को 1980 तक गंभीरता से नहीं लेते थे। 1980 के विधानसभा चुनाव में कश्मीरी पंडित प्राचार्यजी की वजह से विधायक बहनोई गोपाल जोशी के दावे को पछाड़कर कल्लाजी बीकानेर शहर से कांग्रेस की उम्मीदवारी ले आये तो लोगों को भरोसा ही नहीं हुआ।
लेकिन सूचना आते ही मुझे भरोसा हो गया, बधाई देने के बहाने से एकमात्र पारिवारिक स्कूटर ले जाने की इजाजत घर वालों से ली, और डागा चौक स्थित कल्लाजी के घर पहुंच गया। तब तक भी मुहल्ले तो क्या घर में भी कोई हलचल नहीं थी। मैं अकेला ही था, अपने प्रध्यापकजी को बधाई दी, और तभी से साथ लगने की हिदायत भी सुनी। तुरंत ही उन्होंने पूछ भी लिया कि 'क्या लेकर आया है'। मैं तब साइकिल पर ही चला करता था। बताया कि स्कूटर पर आया हूं तो बोले 'चल, कोटगेट तक चलते हैं'। सभी तरह की हलचल का कोटगेट हमेशा केंद्र रहा है। कोटगेट तक आ लिए, लोगों में कोई उत्साह नहीं, ना किसी ने बधाई के लिए रोका।
निराश हुए कल्लाजी बोले 'चल दाढ़ी बनवा कर दो-तीन फोटो खिंचवा लेते हैं, पेम्फलेट-पोस्टर के लिए'।
उन्हें मैं महात्मा गांधी रोड स्थित रोज़ हेयर कटिंग सैलून ले गया, दाढ़ी बनाने तक किसी ने नहीं पहचाना तो मैंने दाढ़ी बनाने वाले कारीगर से कहा कि ये बीडी कल्लाजी हैं, शहर से कांग्रेस का टिकट मिला है।' यह सुनकर भी कारीगर के चेहरे पर कोई भाव नहीं बदले।
सैलून से निकल कर पास ही के इंडिया स्टूडियो चले गये, तब मेरा वहां काफी आना-जाना था। मालिक भंवर खेड़ा खुद थे, मैंने उम्मीदवारी की सूचना देते हुए कहा कि कल्लाजी के दो-तीन फोटो खींच दो, ब्लॉक बनवाने है। सूचना सुन कर भी कल्लाजी के सजातीय भंवरजी के चेहरे पर कोई उत्साह नहीं, तब उनके लिए कल्लाजी का महत्व इतना ही था कि वे मेरे साथ आये हैं। बाद में तो भंवरजी उनके निकटतम लोगों में गिने जाने लगे। फोटो खिंचवाने के बाद मैंने पूछ लिया, अब कहां चलें, हतोत्साहित हो चुके कल्लाजी ने कहा 'वापस घर ही छोड़ दे'। कोटगेट होते हुए फिर निकले, लेकिन बधाई-शुभकामनाओं के लिए रास्ते में किसी ने नहीं रोका।
घर की तरफ मुड़ने लगा तो कल्लाजी ने सामने (डागा) चौक में पान की दुकान पर उतारने का कह दिया। स्कूटर से उतर कर कल्लाजी पान की दुकान की चौखट पर बैठ गये। आज कल्लाजी के चौक में होने पर भारी हलचल वाले उसी डागा चौक में उम्मीदवारी की घोषणा होने के चार-पांच घंटे बाद भी कोई चहल-पहल नहीं थी।
लेकिन तब के बाद राजनीति के मंजे खिलाड़ी भाईसा (जनार्दन कल्ला) ने स्थाई व्यवस्था कर दी कि घर से निकलने पर 'बुले' के साथ कम से चार-पांच लोग तो रहेंगे ही। यह व्यवस्था आज तक जारी है। ―दीपचन्द साँखला
20 दिसंबर, 2020 फेसबुक टीप