Thursday, July 14, 2016

चुनाव तो दूर, फिर भी; जबानी लप्पा-लप्पी में संकोच कैसा? (1)

प्रदेश की विधानसभा के चुनाव दिसम्बर, 2018 में होने हैं, यदि तय समय पर होते हैं तो लगभग ढाई वर्ष शेष हैं। ऐसे में किसी क्षेत्र के संभावित उम्मीदवारों की चर्चा करना कइयों को जल्दबाजी या अधकचरी बात लग सकती है लेकिन जब उम्मीदवारी को आतुर नये-बोदे नेता मुंह धोने लगे हों तो बात करना अधकचरी तो हो सकती है, जल्दबाजी नहीं।
बीकानेर शहर के पूर्व और पश्चिम, दो विधानसभा क्षेत्र हैं। पूर्व से फिलहाल अस्सी पार के गोपाल जोशी विधायक हैं और निजी चर्चा में अगला चुनाव ना लडऩे की बात वे बहुधा कहते रहे हैं। मन हो तो भी पार्टी उम्मीदवार उन्हें शायद ही बनाए। 1980 में कांग्रेस का टिकट न मिलने की कसक गोपाल जोशी ने 2008 में तब निकाल ली जब रिश्ते में साले डॉ. बीडी कल्ला को उन्होंने पटखनी दी। बची-खुची कसर उन्होंने 2013 में डॉ. कल्ला की धोबी पछाड़ करके निकाल ली।
गर्म तो नहीं पर शहर में छिट-पुट चर्चा होने लगी है कि अगला चुनाव नेताओं की दूसरी-तीसरी पीढ़ी के बीच लड़ा जाएगा। टिकटों की मारामारी भी नई पीढ़ी के बीच रहनी है। कभी खांटी कांग्रेसी रहे मित्रद्वय-गोपाल जोशी और अब स्मृतिशेष मक्खन जोशी दोनों की नियति ने इनको उसी भारतीय जनता पार्टी में ला पटका जिसके कभी ये धुर विरोधी रहे। कहते हैं गोपाल जोशी के चलते मक्खन जोशी को कांग्रेस में कुछ हासिल नहीं कर पाने की बात समझ आयी तो बजरिये समाजवाद के जनता पार्टी, जनता दल और अन्तत: भाजपा में पहुंच गए। पिछली सदी के सातवें दशक में इस तिकड़ी के तीसरे पूरक डॉ. बीडी कल्ला के बड़े भाई जनार्दन कल्ला भी थे। जनार्दन कल्ला जिन्होंने कांग्रेस में रहते लिहाज में बहनोई गोपाल जोशी को पटखनी देने की इच्छा को दबाए रखा। भारतीय राजनीति में उथल-पुथल भरे रहे आठवें दशक में यहां भी उथल-पुथल कम नहीं हुई। आठवें दशक के शुरू में मक्खन जोशी कांग्रेस से छिटके तो बाद में स्थितियां ऐसी बनी कि गोपाल जोशी भी उस दहलीज तक पहुंच गये, जहां से अंत-पंत उन्हें कांग्रेस से छिटकना पड़ा।
अग्रज जनार्दन कल्ला, अग्रज तुल्य मक्खन जोशी और बहनोई गोपाल जोशी के राजनीतक रुतबे से चुंधियाए डॉ. बीडी कल्ला की भी महत्त्वाकांक्षाएं इसी दशक में मुसकने लगी, पत्रकार मित्रों ने हवा दी और नेहरू-गांधी परिवार के निकट जनों तक की पहुंच ने अग्रज जनार्दन कल्ला को ओवरटेक करने और बहनोई का लिहाज छोडऩे का दुस्साहस बीडी कल्ला ने अंतत: कर ही लिया। उस दुस्साहस से उहें बहुत कुछ हासिल भी हुआ। 1980 के विधानसभा चुनावों में सबको चकरघिन्नी करते हुए डॉ. कल्ला बीकानेर सीट से ना केवल कांग्रेस का टिकट ले आए बल्कि चुनाव जीत कर सरकार में हिस्सेदारी भी ले पड़े।
जैसा कि पहले कहा जाता रहा है, चूंकि डॉ. कल्ला की तासीर शुरू से जनप्रतिनिधि की ना होकर अफसराना है और उसी को पोखने के लिए वे विधायक और मंत्री बने हैं। अफसर बनते तो जैसे-तैसे सेवानिवृत्ति तक ही अफसराई को पुष्ट कर पाते। डॉ. बीडी कल्ला भूल गये कि वे जनप्रतिनिधि हैं और अधिकतम पांच वर्ष बाद तो जनता के बीच उन्हें जाना पड़ेगा। इसी भूल का खमियाजा वह इस बार तीसरी दफे भुगत रहे हैं, बावजूद इसके, तब से लेकर अब तक वे जयपुर में ही रह कर बीकानेर का जनप्रतिनिधि होने की रस्मअदायगी करते हैं। इस तीसरी हार के बाद धरने-आन्दोलनों के बहाने कभी-कभार उपस्थिति जरूर दर्ज करवा देते हैं। उन्हें अभी भी यह अहसास नहीं है कि कोई चमत्कार नहीं हुआ तो इतने भर से जनता का भरोसा वे चौथी बार भी खो देंगे।
डॉ. कल्ला को पार्टी से उम्मीदवारी मिलने की गारंटी भी अभी नहीं माननी चाहिए। क्योंकि जिन अशोक गहलोत के खेमे में उन्होंने पुन: घुसपैठ की है, उन गहलोत की हैसियत भी राहुल गांधी के पार्टी हाइकमान रहते अगले चुनावों तक कैसी रहेगी यह तय नहीं है, ऊपर से लगातार दूसरी बार और कुल जमा तीसरी बार चुनाव हार चुकने का दाग अलग लगा हुआ है। यह भी कि आगामी चुनाव तय समय पर हुए तब तक कल्ला की उम्र सत्तर को छूने की होगी। ऐसे में अधेड़ होते राहुल की युवाओं को आगे लाने की इच्छा कायम रही तो भी कल्ला की उम्मीदवारी खटाई में पड़ते देर नहीं लगेगी। चूंकि कल्ला बंधुओं की फितरत है कि वे दूसरों पर भरोसा नहीं करते है, अपनों के अलावा अन्यों की तवज्जो नहीं करते हैं इसी के चलते हो सकता है पार्टी उम्मीदवारी अपने कुटुम्ब से बाहर ना जाने देने की खैचल वे जरूर करेंगे।
कहने को शहर कांग्रेस अध्यक्ष यशपाल गहलोत क्षेत्र की अन्य बड़ी जाति माली समुदाय से आते हैं लेकिन बीकानेर-पश्चिम के लिए पुष्करणा समुदाय की परम्परागत दावेदारी के चलते यशपाल की पतंग पश्चिम में शायद ही बढ़े। हां, पिछले चुनाव में दावेदारी की दौड़ लगा चुके और अब पैर पीछे खींच चुके कांग्रेस के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष मोतीलाल बोहरा के दामाद राजू व्यास के सहारे से दावेदारी की ओर बढऩे वाले कल्ला परिवार के पूर्व वफादार राजकुमार किराड़ू की दावेदारी को लोग जरूर पुख्ता मानने लगे हैं। किराड़ू की कांग्रेस के राष्ट्रीय मुख्यालय तक पहुंच और लगातार वहां आवाजाही उनकी दावेदारी में दम भी जाहिर करती है। लेकिन लोगों का मानना है कि कल्ला बंधु किराडू के आडी लगाने की कोशिश भी भरसक करेंगे और इसके तोड़ में वे अपने ही परिवार के किसी युवा का नाम आगे बढ़ायेंगे। दोनों पार्टियों के संभावित युवा दावेदारों की चर्चा अगले अंक में करेंगे।
क्रमश:

14 जुलाई, 2016

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