Saturday, September 28, 2013

‘राइट टू रिजेक्ट : परिवर्तनकारी लोकतान्त्रिक अधिकार

कल सुप्रीम कोर्ट ने लोकतान्त्रिक जड़ों को मजबूत करने वाला एक और फैसला दिया। संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति के मौलिक अधिकार को व्याख्यायित करते हुए कोर्ट ने आम चुनावों में मतदाताओं को यह अधिकार दिया है कि उसकी पसन्द का उम्मीदवार कोई ना हो तोराइट टू रिजेक्टयानीइनमें से कोई नहींका बटन दबाकर अपनी राय को गोपनीय तरीके से प्रकट कर सकता है। विनायक ने 1 दिसम्बर, 2012 के अपने सम्पादकीयराइट टू रिकॉल, राइट टू रिजेक्टमें इस पर चर्चा की थी, पाठकों को सुविधा के लिए उसे ज्यों का त्यों इस उम्मीद के साथ प्रकाशित कर रहे हैं कि संसद के दो घटक कार्यपालिका और व्यवस्थापिका इस मसले पर कोर्ट के दागी राजनेताओं के मामले में दियाआपानहीं दोहराएंगे।
पिछली सदी के सातवें-आठवें दशक में लोकनायक जयप्रकाश नारायण नेराइट टू रिकॉलकी बात की थी, यानी आपने अपने जिस प्रतिनिधि को संसद, विधानसभा और स्थानीय निकाय में चुनकर भेजा है, यदि वह आपकी आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतरे तो उसे वापस बुलाया जा सकता है, उसका निर्वाचन रद्द किया जा सकता है। जेपी ने निर्वाचन प्रणाली में एक और बदलाव चाहा, वह थाराइट टू रिजेक्टयानी मतदान के समय आप यदि किसी को भी चुनने योग्य नहीं मानते हैं तो मतपत्र या ईवीएम में यह विकल्प दिया जायकोई भी नहीं इन बातों को चालीस साल से ज्यादा हो गये, तब से अब तक इन दोनों बदलावों पर जब तब कभी मुखर तो कभी सामान्य चर्चा होती रही है।
इन दोनों ही बदलावों पर हाल में जबरदस्त चर्चा अन्ना आन्दोलन के समय हुई, अन्ना ने चुनाव प्रणाली में इन दोनों बदलावों की पुरजोर मांग की थी। सभी तरह के चुनाव विशेषज्ञ-विचारकों ने इन पर गम्भीरता से विमर्श किया और लगभग एक राय हुए किराइट टू रिजेक्टतो सम्भव है और यह बदलाव होना चाहिए। लेकिन कुछ का मानना था किराइट टू रिकॉलबहुत पेचीदा है और यह केवल महंगा साबित होगा बल्कि अव्यावहारिक भी है। क्योंकि इसमें दो अतिरिक्त निर्वाचन प्रक्रियाओं से गुजरना होगा, पहले अस्वीकार या रिजेक्ट के लिए मतदान और फिर नया प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान। यह एक विचार हो सकता है लेकिन प्रतिनिधि का चुनाव गलत हो जाता है तो केवल उसे तीन से पांच साल तक बर्दाश्त करना होता है और यह भी कि वह क्षेत्र, जिस से वह चुन कर आया है, वह एक प्रकार से प्रतिनिधिहीन ही माना जायेगा, जो ज्यादा चिन्ता की बात है। पिछले साठ सालों का अनुभव है कि इस तरह की स्थितियां देश के अधिकांश क्षेत्रों में अकसर देखने को मिलती हैं। इससे छुटकारे का समाधानराइट टू रिकॉलही है।
राइट टू रिकॉल के अन्तर्गत ही प्रदेश के मांगरोल कस्बे की नगरपालिका के अध्यक्ष को हटाने की प्रक्रिया अभी हाल ही में शुरू हुई है। प्रदेश में स्थानीय निकायों की निर्वाचन प्रणाली में इस तरह का प्रावधान है और ऐसा पहली बार घटित हो रहा है। इसके प्रथम चरण में अध्यक्ष के खिलाफ पालिका बोर्ड का अविश्वास प्रस्ताव पारित हो गया है। अब जनता अपने वोट से यह तय करेगी कि उन्हें पालिका अध्यक्ष रखना है कि नहीं। परिणाम चाहे कुछ भी आए, इसे भारतीय लोकतान्त्रिक प्रणाली के लगातार परिपक्व होने के प्रमाण के रूप में देखा जाना चाहिए। दुनिया के कई देशों की निर्वाचन प्रणालियों में वहां के मतदाता कोराइट टू रिकॉलऔरराइट टू रिजेक्टजैसे दोनों हक हासिल हैं।
भारत में यदि सभी तरह के चुनावों में यह दोनों बदलाव लागू किए जाते हैं तो भ्रष्टाचार भी कम होगा, प्रतिनिधि मतदाता शिक्षित और परिपक्व भी होंगे और प्रकारान्तर से देश का लोकतन्त्र और भी मजबूत होगा।
विनायक, 1 दिसम्बर, 2012
(एक दिसम्बर के इस सम्पादकीय के विचारोपरान्त विनायक भी अब यह मानने लगा है किराइट टू रिकॉलजैसी प्रक्रिया अपने इस विशाल मतदातावाले देश में अव्यावहारिक होगी और यह भी किराइट टू रिजेक्टजैसा हक मिलने के बाद इसके वैसे ही परिणाम आएंगे जैसे गांधी को डांडी कूच में मिले थे गांधी की इस घोषणा का गांधी के आलोचकों ने ही नहीं उनके निकटस्थों ने भी यह कह कर आलोचना की थी इससे कुछ होना जाना नहीं है। लेकिन गांधी के कूच को जो व्यापक जन समर्थन मिला उसकी कल्पना ब्रिटिश हुकुमत सहित किसी ने नहीं की थी। इसी तरहराइट टू रिजेक्टके बटन की ताकत को जैसे-जैसे समझा जाने लगेगा, अयोग्य और भ्रष्ट उम्मीदवार स्वतः ही ठिठक कर किनारा करते चले जाएंगे, हां समय कुछ ज्यादा लग सकता है, वह इसलिए भी कि मतदाता को अपनी राय जाहिर करने का अवसर पांच साल बाद ही मिलता है, जो व्यावहारिक भी है।)
28 सितम्बर, 2013


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